Thursday, April 17, 2014

घोंचू


'घोंचू',  उसे प्यार से पुकारती हूँ मैं. कई बार ख़ुद को कोसा भी है कि मुझ से ज्यादा कई गुना अक्लमंदी और गुण तो उस में भरे पड़े हैं फिर काहे इतनी तुनक दिखाऊं मैं !

मगर फिर उसे ना दिखाऊँ तो भला किसे ये बेसिरपैर की सोचने-गुनने वाली लड़की पर तरस आएगा ! इतने दुलार से  भला कौन उसके सर पर हाथ फेरेगा ! हँसी आती है जब शुरुआत में लोग कहते थे कि ''तुम उसकी मदरिंग करने लगोगी''. सच्चाई तो ये है कि उसने मेरी गार्डियनशिप मुझसे कहीं ज्यादा ली है. सुलझा हुआ और एक सीधी-सादी ज़िंदगी जीने वाला लड़का जा कर गिरा भी तो कहाँ !

इमरती से  भरी हुई कढ़ाही जैसा दिमाग लेकर घूमने वाली लड़की के चक्कर में.

कोई बड़े आदर्श नहीं ! बस जितना एक व्यक्ति भर को सम्मान दिया जाना चाहिए उतना ही आराम से देता है मुझे भी और बाकी सबको भी. जो अमृतसर के जलियाँ वाला बाग़ का इतिहास पढ़ के रोने लगा था. जो किसी तीसरे आदमी की परवाह भी अपनी तरह ही करता है. जो छोटे-छोटे अनदेखे कर दिए जाने वाले नियमों-कानूनों पर सिस्टम से बहस करता है. और ये सब बगैर किसी लाग-लपेट के एकदम चुपचाप.

मैं हमेशा कहती हूँ 'अखिल' मेरे जीवन के सारे संघर्षों और दर्दों को बगैर शिक़ायत सहन किये जाने का सबसे नायब रिवॉर्ड है. हाँ उसकी किस्मत इस मामले में मुझ जितनी अच्छी नहीं रही. बेचारे ने ना जाने कौन से जन्म का उधार चुकाना था कि मुझ से आ टकराया ;)

ह्रदय की अनन्यतम गहराइयों तक भरपूर सुकून है कि वो मेरा है, नितांत मेरा.

मेरा अखिल !



हाँ फोटो खिंचवाने लगो तो वो कोई और ही हो जाता है. कैमरा देख कर उसके चहरे के सारे हाव-भाव को साँप सूंघ जाता है. तभी ना कह पुकारती हूँ उसे:

घोंचू !



  

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