Thursday, April 17, 2014

सरमाया


बीत रहे थे लम्हे पर यादों से नम ना थे
ज़िन्दगी थी मगर नए मौसम ना थे  
तकिये पर ख्वाबों के फूल थे कढ़े हुए
जो खिल जाए सुबह, उजालों के आलम ना थे

था सब कुछ मगर थमा सा था
फलक पे चाँद गुमुसुम जमा सा था
मैं उलझा था अनकहे सवालों में   
हम गुज़र रहे थे मगर वक़्त थमा सा था


तुम जो आये तो चाँद ज़मीं पे चला आया है
तुम जो आये तो तन्हा सूरज घबराया है
तुम जो आये तो ज़िंदगी हैरां-हैरां है बहुत
तुम जो आये तो जीने का सामां है बहुत

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