बीत रहे थे लम्हे पर यादों से नम ना थे
ज़िन्दगी थी मगर नए मौसम ना थे
तकिये पर ख्वाबों के फूल थे कढ़े हुए
जो खिल जाए सुबह, उजालों के आलम ना थे
था सब कुछ मगर थमा सा था
फलक पे चाँद गुमुसुम जमा सा था
मैं उलझा था अनकहे सवालों में
हम गुज़र रहे थे मगर वक़्त थमा सा था
तुम जो आये तो चाँद ज़मीं पे चला आया है
तुम जो आये तो तन्हा सूरज घबराया है
तुम जो आये तो ज़िंदगी हैरां-हैरां है बहुत
तुम जो आये तो जीने का सामां है बहुत

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