Friday, April 11, 2014

हॉस्टल ९ के म्युज़िक रूम में दाखिल होने पर देखा कुछ अजीबोगरीब से लोग हाथ में गिटार लिए हुए खड़े थे. एक दुबला-लंबा सा लड़का, एक लड़का अजीब सी दाड़ी के साथ, लम्बी नाक के साथ शर्मीला सा एक और लड़का, एक गायक जो बिलकुल साउथ स्टाइल चेहरे के साथ मगर अच्छी खासी हिन्दी बोलता था और सबसे नामूनादार मेरा पहला साथी सुमन. मुझे बुलाया गया था किसी तो बैंड कम्पटीशन के लिए गाना लिखवाने के लिए. हैरान सी मैं इन सभी को देख रही थी. ये सब अंग्रेज़ी गाने वगैरह वगैरह ना तो समझ में आते थे और ना ही पसंद आते थे. मैं अचानक सभी को देख कर थोड़ा घबरा गयी थी. तब तक भी मैं शायद गंभीर से एक लडकी हुआ करती थी. जिसे आई आई टी आने के बाद सबसे बड़ी हैरानी यही थी कि छोटी उम्र के लड़के उसे दीदी कह कर सम्बोधित क्यूँ नहीं करते.

खैर इन सब बैंड मेम्बेर्स के बीच सर पे काऊबॉय हैट डाले ड्रम किट के सामने बैठा हुआ गोल मटोल मुस्कुराता सा एक लड़का था. जिसे पहली दफा मैंने उसे उसकी यादगार मुस्कान के लिए ही याद रखा और जिसने दुसरे ही पल में मुझे एक कमेंट मार के शर्मिंदा कर दिया. मैंने अपना लिखा हुआ गीत सुनाते हुए सबकी तरफ देखा और पूछा “आप लोगों को इस पर हँसी तो नहीं आ रही ना ! इस पर सबने प्यार से ना के इशारे के साथ अपने सिर हिलाए मगर तब तक इस लड़के ने तुरंत जवाब दिया, “हमें तो नहीं आ रही है, क्यूँ आपको आ रही है क्या?” फोर्मलिटी के लिए पूछे गए अपने ही सवाल ने शर्मिंदा कर दिया.

फिर एक-आध बार यूँ ही चलते-फिरते मुलाकातें हुई. मुझे यूँ तो लोग जल्दी याद नहीं रहते मगर उसकी मुस्कराहट उसकी सबसे बड़ी पहचान थी. मुझे याद है कि एक बार सुमन और मेरे साथ बेवजह वो हॉस्टल १३ के बाहर आधी रात के बाद बहुत देर तक खड़ा रहा. उसे ना तो सुमन और मेरी फ़िज़ूल बातें समझ आ रही थी और ना ही हमारे आला दर्जे के घटिया चुटकुलों पर हँसी, मगर तो भी वो वहीँ रुका रहा. उसके चेहरे से साफ़ दिखता था कि उसे बातों में कोई दिलचस्पी नहीं है फिर भी वो ठहरा रहा, ठीक वहीँ पे चुपचाप. लौटते हुए उसने मुझे बचपन के कई किस्से सुनाये, कई बातें बताई और एक मोड़ पर जहाँ से उसे अपने हॉस्टल की तरफ मुड़ना था वो वहां पर खड़ा रहा. चुपचाप . मानो वो चाहता हो कि कई और भी बातें हों मगर क्या हों उसे ये मालूम ही नहीं. मुझे सचमुच एक मिनट के लिए तरस हो पाया उस पर फिर मैंने उसे जाने का इशारा किया.
अगले दिन मैंने सुमन से कहा, ये लड़का बहुत अलग है और बहुत अजीब भी. फिर कई दिनों तक कोई मुलाक़ात नहीं. कोई ताल्लुक़ नहीं. और कुछ महीनों बाद पैफ आया. पैफ जहाँ मुझे सभी ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था, ठीक उसी पैफ में अचानक लोगों ने मुझसे आकर कहा “आपको गाने लिखने हैं” बहुत जिद के बाद मैंने हाँ कर दी. मैं सब लोगों से कुड़ी हुई बैठी थी कि अचानक पहली मीटिंग में फिर यही लड़का दिखा. हँसते हुए लेकिन बगैर कॉन्फिडेंस के हाई हेल्लो करता हुआ. थोड़ा सुकून हुआ ही था कि अचानक किसी से कह दिया “भाई प्रसून जोशी ने तो गुलज़ार को बहुत पीछे छोड़ दिया है” अब मुझे काटो तो खून नहीं. इसके आगे मैं चुप नहीं रह सकी और जैसे ही एक और बेसिरपैर की बहस शुरू होने ही वाली थी कि इस लड़के ने कुछ तो बोल कर दोनों पक्षों के ईगो शांत किये और गाने पे चर्चा शुरू की. अचानक मैंने नोटिस किया कि ये लड़का इतना बुढहू भी नहीं है जितना दिखता है.  बहुत सारी मीटिंग्स के दौरान कई कई जगह मैंने देखा और मुझे थोड़ी सी शर्म भी हो आयी कि मैं उम्र में बड़ी होने के बावजूद एक छोटी सी बात भी ढंग से नहीं कर सकती और ये लड़का कैसे इतनी आसानी से चीजों को सुलझा लेता है. अचानक वही पैफ अच्छा और मजेदार लगने लगा. वो बात अलग है कि अपने पैफ से ज्यादा बेहतर गाने मैंने उसी साल दुसरे पैफ के लिए लिखे :P आई आई टी में आने के बाद मैं अपनी हिंदी को लेकर बहुत केयरफ्री हो गयी थी. सोचती थी किसे क्या ही मालूम होगा मगर कमबख्त ये लड़का गाने लिखते वक़्त मेरी गलतियां ढूंढ निकालता. ऊपर से इसके सामने हड़बड़ी में और ज्यादा गलतियां होती.
पैफ ख़त्म हुआ और यहीं पर इस बातचीत का आख़िरी सिरा भी. मेरा अनुभव इतने अच्छे मोड़ पर आकर ख़त्म होगा ये सोचा नहीं था. रात में उसे लिख कर भेजा ‘तुम सभी के साथ काम करके बहुत मज़ा आया’. तब से मुझे म्युज़िक जनता से प्यार हुआ और ड्रम जनता से चिड़. किसी दिन किसी तो पैफ ट्रीट के लिए शायद उसने कॉल किया मगर मैंने बात टाल दी और उसके बाद बातचीत के सारे दरवाज़े बंद हो गए.


कई दिनों बाद जब मैं अपने किसी दोस्त के साथ बाहर बैठी हुई थी तब मैंने उसी लड़के को अपने दोस्तों के साथ जाते हुए देखा. मैंने उसे हाथ हिलाते हुए हाल-चाल पूछे तो उसने लगभग टालने के अंदाज़ में जवाब दिया. मुझे बहुत अजीब लगा. मुझे अब तक याद है उसने मेरी तरफ देखे बगैर हाथ हिलाया और दोस्तों के साथ चलता रहा. मेरे साथ बैठे हुए दोस्त ने कहा “तुम्हे समझ नहीं आता क्या? वो हाई है” मैंने जवाब दिया मगर वो ऐसे कभी बात नहीं करता तब सामने से जवाब आया कि अरे वो बड़े लोग हैं, इंस्टी का बेस्ट ड्रमर है वो. खैर बात वहीँ पे ख़त्म हो जाती अगर अगले दिन जब मैं लैब में अकेली बैठी हुई उस लड़के के चैट पर ‘ट्रीट पर चलने वाले प्रस्ताव के लिए हाँ नहीं करती’. मुझे मन ही मन थोडा अजीब लगा कि ‘मुझे ट्रीट क्यूँ ! मैं तो अच्छे से जानती भी नहीं’ और यही सवाल मैंने उस से भी पूछा. उसने कुछ गोलमोल जवाब देकर हाँ करवा ली मगर असल गलती तब हुई जब लगे हाथों उससे ये पूछने की गलती भी कर डाली कि अगर वो खुद को संभाल नहीं सकता तो पीता क्यूँ है? जवाब आया कि ‘संभाल लेता हूँ, वो तो बस सामने आप खड़े थे इसलिए...’ इस पर मुझे भाषण देने का मौका मिला और मैंने चूका नहीं. उसने झक मारकर तुरत फुरत जवाब दिया:                                     

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