Saturday, April 12, 2014

पुराने ख़त का नया लिफ़ाफ़ा



कई चेहरों में जानते हैं यहाँ लोग मुझे.
टुकड़ों-टुकड़ों में मिलती हूँ सबसे 
मैं मगर "मैं" से मिलूं, ऐसा मुझे सब्र कहाँ !
क्यूँ भला याद रखूं !
नाम मेरा जिस पर ना जाने कितने जाने जाते हैं.

मगर तुम जब भी मुझे,
यूँ ही बुला लेते हो.
कंधे पे जैसे हाथ की गर्माहट
पसर आती है फिर चेहरे तलक,
मुद्दतों बाद कपड़ों पे लगी घर की हल्दी.
कानों में मंगल गीत गुनुगुनाती है.
हर की भीड़ पड़ोसन के मुस्कराहट सी
दिन को खुशुनुमा बना कर, मुझे  
रात को दिल पे थपथपाती है
खुदा भी थोड़ा थोड़ा अपने जैसा लगता है.

ये गुरूर जो तुम रगों में भर-भर के देते हो,
तुम्हारी आवाज़ में गर सुन लूं तो,
खुद का नाम फिर दुनिया से जुदा लगता है....

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