Sunday, April 13, 2014

माँ की चिठ्ठी का जवाब


प्यार में नींद की कई गोलियां डकार जाते हैं  

शायद तभी

बहुत देर तलक बिस्तर पर पसरे रहते हैं 

हम

नींद में अक्सर फिसल पड़ते हैं रास्ते 

इसीलिए सुबह तक एक-दूजे को संभाल रखते हैं 

लिहाफ की ठण्ड काफी नहीं

तो ओड़ लेते हैं 

एक दूसरे  की गर्मी 

आँखों की नमी को चूम लेते हैं अक्सर दोनों 

तो आँखें भी अमूमन गीली नहीं रहती 

हाँ , जब सोते हैं तो आखें खुली रहती हैं 

हमारे सपनें गालों पे बोसे लेते हैं 

हमारे पाँव के तले बर्फ नहीं, घास जमती हैं 

हम बोते हैं लम्हों के बीज 

एक-एक लम्हा उगता है, पनपता, फलता-फूलता है 

और फिर हम उनकी छाँव में 

दोपहर की कड़ी धूप तले  बैठते, बतियाते, ऊंघा करते  हैं 

हाथ की चाशनी में घोल कर 

खिलाते हैं टुकड़ा-टुकड़ा 

मिट्टी के घड़े का पानी पीते हैं 

हम एक दूजे का हाथ नहीं, साथ पकड़ा करते हैं 

इसलिए कभी

रिश्तों की भीड़ में गुम होने का कोई डर ही नहीं 

वो पहचान लेता है मेरी आँखों का रंग 

और मुझे भी तो उसकी नज़र की पहचान है ना !

तंगहाल सही 

गृहस्थी मज़े से कट रही है अपनी 

देखो ! तुम फिक्र बिलकुल भी न करना लेकिन 

प्यार को हमारे नज़र मत लगा देना कहीं ! 


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