हर करवट के साथ
थोडा टूटना.
हर लम्स में
सब कुछ पीछे छूटना...
ख़ामोशी से खेलती
उसकी अल्हड़ आँखों की बेबाकियाँ
मुझको मुझ ही में तलाशती
उसके हाथों की गर्म खुशबू
कुछ भी सिमटता ही नहीं
बस सदियाँ सी बीत जाती हैं...
बहुत देर तक पसरी रहती है
मेरे जिस्म पर,
उसके जिस्म की हर आहट....
थोडा टूटना.
हर लम्स में
सब कुछ पीछे छूटना...
ख़ामोशी से खेलती
उसकी अल्हड़ आँखों की बेबाकियाँ
मुझको मुझ ही में तलाशती
उसके हाथों की गर्म खुशबू
कुछ भी सिमटता ही नहीं
बस सदियाँ सी बीत जाती हैं...
बहुत देर तक पसरी रहती है
मेरे जिस्म पर,
उसके जिस्म की हर आहट....
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