तुम डरना मत
जो कभी आँखों में आँखें डाल कर
कह दूं तुम्हे
जाओ यहाँ से !
और मुड़कर पास भी आना नहीं।
तुम डरना मत
जो कभी पहचान कर इंकार कर दूं
रास्ते से और तुम से
कट के मुड़ जाऊं कहीं।
तुम डरना मत
जब कभी पहचान कर आवाज़ को
चुपचाप रख दूं फ़ोन को वापस वहीं
और घूरती चाहे रहूँ फिर दस मिनट तक
पर तुम्हें
भूल जाने का जतन जतलाऊँ तो।
तुम डरना मत
जब तुम्हारी चिठ्ठियों को फाड़ फेंकूं
और जला के राख कर दूँ
फिर तन्हाई में सूँघती फिरूँ सारी पुरानी चिठ्ठियाँ।
तुम डरना मत
कि इतनी आसानी से मुझको खो पड़ोगे
कि सारे लम्हें एक पल में
बेटिकेट सा एक लिफाफा बन के गुम हो जायेंगे
कि भूलना तुमको-मुझे आसान सा एक काम है
कि ज़िन्दगी का गणित कमज़ोर इतना है बहुत
कि प्यार जैसा लफ्ज़ तक टिकता नहीं ईमान में
ये सोच के पीछे न मुड़ जाना कहीं।
हाँ देखो ! ज़िन्दगी की हर लड़ाई
प्यार के व्यापार में
जीतने और हारने से
नाप-तुल के, सोच और हिसाब से होती नहीं।
बस कुछ न सुनना, सोचना और बोलना
कस कर पकड़ लेना मेरे इस हाथ को
कंधे पे सर को रख देना
और देख कर बारिश सी आँखों को मेरी
मूँद लेना आँख और फिर रात भर
तकिये पर मेरे खुशबूएं ख्वाबों भरी
गालों पे बोसे थपकियों से
दिल में मेरे नर्म गर्मी छोड़ कर
तुम गर चले भी जाओगे
मैं देर शाम तक खिड़की पे कुहनी को टिका
देखा करूंगी तुमको जानम
लौट कर दिल तक मेरे आते हुए।
बस इतना ही काफी है मेरे रूठने के वास्ते।
बस इतना ही काफी है मेरे रूठने के वास्ते।
छोड़ो भी मगर,
तुम कहाँ समझते हो भला
ये छोटी-छोटी सी बातें प्यार की

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