Saturday, April 12, 2014

दिल के भीतर छुपी हुई नन्हीं बच्ची
फिर से गुड़िया का घर बनाती है
दोस्तों को न्यौता भेज कर
जल्दी-जल्दी में सब निपटाती है
उसका बेसब्र फ्रॉक हवाओं में फरफराता है
नन्हें हाथों से गुड़िया का घर सजाती है

दिल के भीतर छुपी हुई नन्हीं बच्ची 
आज बिन बात मुस्कुराती है 
शर्म से गुलाबी गालों को 
पोंछ-पोंछ कर सबसे गुपचुप छुपाती है 
माँ की चुन्नी में लिपट कर, आईने से 
बात करती है ढेरों गीत गाती है 


दिल के भीतर छुपी हुई नन्हीं बच्ची 
ज़माने को किनारे लगा कर 
दिल की दुनिया से बाहर निकल आयी है 
बंद रोशनदानों में रंग भर कर धनक के सारे 
बेजान दीवारों पे गीत लिख आयी है 
बेसबब फिरती है बेबात मुस्कुराती है 
दिल के भीतर छुपी हुई नन्हीं बच्ची
फिर से गुड़िया का घर बनाती है



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