Tuesday, August 26, 2014

दावत नामा


वो अक्सर चाय बनाते हुए ऊंगलियाँ जला लेता है, 
और इसे कमबख्त रॉक म्यूजिक का शोर पसंद नहीं.
ये जब कवितायेँ सुनाया करती है,
वो ऊँघते-ऊँघते बस हूँ-हाँ किया करता है.
कई मसलों पर झगड़े भी हैं अक्सर दोनों,
ये बात और है कि दरअसल मसला क्या था, मालूम नहीं !
टकराए ऐसे कमबख्त कि टूटा-फूटा भी बहुत,
पर उसकी चमचम बना के दोनों ने,
एक रात सुनहरी कर ली, एक दिन का उजाला बोया.
और अब दोनों साथ-साथ चाय बनाने को,
टेढ़ी-मेढ़ी सी जुगलबन्दियाँ सजाने को,
झगड़े-फसादों में सुर मिलाने को,
साथ ये प्यार जिए जाते हैं,
और आपको
दावत-ए-इश्क़ पे बुलाते हैं.

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