वो अक्सर चाय बनाते हुए ऊंगलियाँ जला लेता है,
और इसे कमबख्त रॉक म्यूजिक का शोर पसंद नहीं.
ये जब कवितायेँ सुनाया करती है,
वो ऊँघते-ऊँघते बस हूँ-हाँ किया करता है.
कई मसलों पर झगड़े भी हैं अक्सर दोनों,
ये बात और है कि दरअसल मसला क्या था, मालूम नहीं !
टकराए ऐसे कमबख्त कि टूटा-फूटा भी बहुत,
एक रात सुनहरी कर ली, एक दिन का उजाला बोया.
और अब दोनों साथ-साथ चाय बनाने को,
टेढ़ी-मेढ़ी सी जुगलबन्दियाँ सजाने को,
झगड़े-फसादों में सुर मिलाने को,
साथ ये प्यार जिए जाते हैं,
और आपको
दावत-ए-इश्क़ पे बुलाते हैं. 
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